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Last Updated on  14-Aug-2018 11:09:49

उज्जैन विश्व का सबसे बड़ा धातुविज्ञानी केन्द्रः- सन्दर्भ- स्वर्णजालेश्वर,

01-Aug-2014,16:52:56,Amazing Ujjain News Portal
   
    उज्जैन का रसरसायन शास्त्र महाअगाध दुर्गम अथाह सागर हे जिसमे रस, उपरस, महारस, विष रत्नमणि तथा औषधामृत भरे पडे है। उसी रस रसायन सागर मे से मुझे अपनी स्पल्प बुद्धि होने पर भी लेखन कार्य उज्जैन महानगरी के पक्ष मे करना पड़ रहा भगवान शिव की कृपाफल है। यह शास्त्र पूर्ण सिद्ध अनुभवो से भरा और गणित के समान निश्चल क्रियाफल वाला है। इसमे 9 + 9 = 18 होते है न की 17 या 19 इसी प्रकार इस शास्त्र की क्रियाएं भी अटल है। प्रायोगिक क्रिया एवं धार्मिक अर्थ जानने वाले के लिए यह शास्त्र अति सरल व प्रत्यक्ष फल दाता है। अज्ञो के लिए अति दुर्बोध व असफल क्रिया वाला तथा असत्य है, इसकी क्लिष्टता एवं जटिलता एवं विचित्र शब्द रचनावली द्वारा क्रियाओं की गोपनीयता का संरक्षण उसी प्रकार से किया गया है जैसे की वेदो एवं श्रुतियों गुद़ अर्थ का जैसे वेद मन्त्र अनेकार्थवाची, गुद़, रहस्यमय, चमत्कारी विज्ञान पूर्ण है, वैसे ही यह रसशास्त्र भी है। इस शास्त्र का मुख्य उद्देश्य तो परामार्थिक सिद्धि की प्राप्ति है तथापि धातुवाद ( धातुवाद को परिवर्तन करना ) एवं देहवाद (देह को परिवर्तन करना है ) यह दो भाग मे प्राचीन वैज्ञानिक रसरसायन शास्त्र विभक है। उज्जैन के आदि गुरू भगवान शिव ने इस सन्दर्भ मे यहां देह-विज्ञानी-धातुविज्ञानी कई सैकड़ो ग्रन्थो का उपदेश दिया है। जो उज्जैन की प्राचीन गुरु पंरपरा का समृद्ध एवं समर्थ उदाहरण है। वैदिक काल से महाभारत काल तक विभिन्न पारसमणी-स्यांतकमणी आदि का उल्लेख आता है । जिनके स्पर्श से केवल धातुये ही नही किन्तु सारी पर्वत-वनाक्रांत पृथ्वी ही स्वर्णमणी बन सकती है। एसी प्रतिज्ञा कई जगह कि गई है। प्रायः यह श्लोक प्रचलित है जो उज्जैन की महत्वता को दर्शाता है।
            ‘‘ शक्यं हि मेदनीः कृत्स्नां सशैलवनकाननाम्
              जातरूपमयं कत्र्तु ममाग्ड़ बीजस्य शक्तितः।‘‘

      प्राचीन युग मे विशाल भारत मे ब्राम्हण पंरपरा की रसरसायन विद्या मुख्य थी। फिर बौद्धाचार्य श्रीनागार्जुन (Medicine Buddha) ने नुतन अविष्कार कर रसरसायन के विशेष प्रयोग कर धातुवाद एवं देहवाद की सरल विधी का निर्माण किया था। सर्व रोगो मे प्रशस्त आरोग्य वर्धनी वटी (द्रव्य) का निर्माण साधको के लिए एवं जनसामान्य के लिए आरोग्यवर्धनी (ठोस) का निर्माण उज्जैन मे ही किया उन्होने जनसाधारण के लिए वैदिक मार्ग के समांनतर रसायनवाद को जनसामान्य की पीड़ा निवारण का हेतु बनाया उन्होने भी कार्य श्री स्वर्णजालेश्वर-क्षिप्रा तट आदि जगह बौद्ध पंरपरा को विकसित करने के लिए किया उसके कई कारण थे जिसमे श्रीस्वर्णजालेश्वर महादेव का सहयोग, अन्य साथीगणो का सहयोग राज्याश्रय और स्वयं उनकी उदार नीती आदि थी। श्रीनार्गाजुन जी ने सैकड़ो शिष्य-प्रशिष्य को रसक्रिया की दीक्षा दी और अनेको को विज्ञान विद बनाकर अन्वेषण- कराया और हजारो को विदेशों मे सरल वैदिक धर्म के नवाचार स्वरूप बौधधर्म पढ़ाया हजारो शिष्यो को विदेश उज्जैन आदि  नगरी से भेजा और खुद भी गये।
    इधर उज्जैन मे वैदिक ब्राम्हण पंरपरा मे प्राचीनता बनी रही युगानुसार नव्य विचारो को अपने शास्त्रों और कर्मो मे स्थान न देने तथा राज्याश्रय न मिलने से नवीनता नवीन अविष्कार का मार्ग अवरूद्ध हो गया। व्यर्थ वितंडावाद और झगडे बढ़े। नवीनता को स्वीकार करके चलने का मानव स्वभाव विज्ञान की और मानवीय झुकाव होने पर समाज ने नये बौद्धो एवं उनके अविष्कारों का साथ दिया उसी समय भारत और विदेशो मे भी नव बौद्धो ने अपने अविष्कारी धर्म की सत्यता जानी और ग्रहण किया तथा करवाया और बौद्ध विश्वधर्म बन गया। श्री स्वर्णजालेश्वर मंदिर अब उस प्राचीन वैभवशाली प्रयोगशाला की याद दिलाते है जिसे बौद्धो के नवाचार के साथ ग्रहण किया। जबकी उज्जैन वासी विज्ञान के सुरज को अपने लिए डुबते हुए देखते रहे और कई शताब्दीयो तक गुलाम बने रहे- ‘ जजिया कर दिये और शिर कटवाये। नवाचार के साथ वैज्ञानिक हिन्दुधर्म-बौद्ध धर्म के रूप मे तिब्बत- चीन- जापान- वियतनाम-कोरिया सहित एशिया सहित विश्व मे फैलकर संबधित देशो को समृद्ध करता गया और हम ग- गधे के रह गये। रसायन की उज्जैनीय शाखाए जिसमे रस रसायनशाला के प्रयोग दृष्टीगत होते है, शैव, पाशुपत, लिंगायत, भैरवपूजक आदि मे विभक्त है सभी मे रसायनखण्ड मिलते है वह सभी उज्जैन की समृद्ध विरासत को दर्शाते है, पंरतु प्रायोगिक तौर पर ?  उज्जैन नगर व क्षेत्र है जहां देहवाद के अमर प्रयोग हुए है भगवान शिव यहां के चिकित्सक- वैज्ञानिक रहे है।
रस- रसायन विद्या की सिद्धी बिना उपास्यदेव की कृपा कदापि नही मिल सकती है, इस विचार को ब्राम्हण-बौद्ध-जैन-और पाश्चात्य प्रदेश के रसविद्ध सब कोई  ने स्वीकार किया है। सामान्यतः भारतवर्ष मे उपास्यदेव भगवान शिव को उज्जैन का आदि गुरू माना गया है, आदि काल से जितने भी कल्पजीवी (अर्थात पृथ्वी सौरमण्डल के समान आयुवाले)
यथा ‘‘ अच्वथामा बतिव्र्यासोहनुमांच्य विभीषणकृपच्च परशरामः सप्तैते चिरंजीविन ’’
      उज्जैन नगरी से जुडे हुए है, श्रीहनुमल्केश्वर, श्रीमार्कण्डेश्वर, श्रीच्यवनेश्वर,  रामेश्वर आदि मंदिर इनकी पृथक-पृथक रसायनवाला के उदाहरण है जो इनके शरीर को समर्थ पृथक दीर्वाजीवी बनाकर सप्तचिरंजीव (यथा- अश्वथामा, राजाबलि, व्यासमुनी हनुमान, विभीषण, कृपार्चाय, परशुराम आदि) मे रसरसायन क्रिया-साधना द्वारा शामिल करते है। यह उज्जैन की कृपा दृष्टि का फल बताते है। क्योकी वैज्ञानिक तौर पर मनुष्य का शरीर का निर्माण जिन रासायनिक संगठनो (देखे  www.Amazingujjainnews.com के चिकित्सा स्वास्थ को) से हुआ है सभी प्राचीन पदार्थ विज्ञान (यथा कणाद का वैश्लेषिकादि) एवं आधुनिक पेरियाडिक टेबल के पदार्थ (तत्व) एवं उनके सुक्ष्म विभाग अर्थात इलेक्ट्रान-प्रोटान-न्युट्रान विभिन्न आवेशित  आयनादि को ध्यान मे रखते हुए प्रत्येक धातु तत्वादि के वर्ण, वजन, गुण आदि मे स्वभाव सिद्ध भेद को ध्यान मे रखते हुए शरीर को रोगमुक्त एवं दीर्घजीवी हेतु शाराीरीक हित मे इन समस्त तत्वो का परिवर्तन दुष्कर होते हुए भी हो सकता है। ऐसा प्राचीन महर्षियों ने निर्णीत किया। चलायमान संसार के जड़ चैतन्य (अजीव-जीव) का मूल एक चैतन्य तत्व है। आधुनिक वैज्ञानिक उसे इलेक्ट्रान, न्युट्रान, प्रोटान आदि कहते है उस एक मे से विभिन्न गुण धर्म वाली सृष्टि का निर्माण हुआ है विभिन्नता क्यो हुई ? किस नियम के आधार से हुई है ? इस ओर प्राचीन वैज्ञानिक ने लक्ष्य दिया ओर नियमो का अन्वेषण किया किस किस धातु का लय किस-किस मे हो जाता है इन सबका लय किसमे होता है समस्त धातुओ के लय या अंत के उपरांत कौन सा द्रव्य शेष रहता है। इसी प्रकार समस्त धातुओ का लय (अंत) किसमे होता है अर्थात संसार के समस्त तत्वो का लय जिसमे होता है, वही सर्वप्रमुख लयकर्ता है जिसका अध्ययन मनन एवं वैज्ञानिक अन्वेषण क्षिप्रा नदी तट पर किया जाता था उस सार्वभौमिक लयकर्ता को अमृत ( Elixin of life देखे) के सहयोगी की तरह द्रव्य रूप मे श्रीस्वर्णजालेश्वर मे कृत्रिम रूप से बनाया जाता था उसी अमृत से स्वर्ण निर्माण भी किया जाता था। उसी स्वर्णकलश अमृत की बुंद का देवासुर संग्राम मे उज्जैन मे क्षिप्रा तट पर गिरने का उल्लेख होता है जिससे सिंहस्थ महापर्व का आयोजन बारह साल मे एक बार होता हैं। यही स्थान प्राचीन श्रीमहाकालवन के अन्तर्गत आता है, जहां देव-असुर ने अमृत का बंटवारा किया था। विश्व मे अमृत का धातुवाद (धातु परिवर्तन) एवं देहवाद (देह का परिवर्तन-कायाकल्प बूढ़ो का जवान बनना) का स्थान उज्जैन के अतिरिक्त कोई है ही नहीं। यही कारण समस्त-वैदिक-पुराणिक-वैदिक-बौध रसायनशास्त्र का निर्माण भगवान शिव के द्वारा यही हुआ और बाद मे विश्व मे जनप्रयोजनार्थ फैले।
    भारत सरकार के वैज्ञानिक इस मामले मे क्या कर रहे है इस हेतु ऐ पत्र लिखा जो संलग्न है, स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। 

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